Posts

Showing posts from September, 2011

ख्वाहिश है, अजंता-एलोरा के भित्ति चित्रों को टैक्सचर के माध्यम से बनाऊं- वरिष्ठ चित्रकार चमन

Image
वरिष्ठ चित्रकार चमन को बाल शिक्षा परिषद, कला भूषण, आई फैक्स, ललित कला अकादमी के कई पुरस्कारों के अलावा तमाम राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। कला के क्षेत्र में इनका इतना व्यापक असर रहा है कि मदर टेरेसा, पंडित रविशंकर, हरिवंश राय बच्चन, अमृता प्रीतम, सोहनलाल द्विवेदी के अलावा देश-विदेश की कई शख्सियत इनकी पेंटिग देखने घर तक आ चुके हैं।  वह कहते हैं, सबसे पहले समाज में हम अपने आस-पास संस्कृति को महसूस करते रहे हैं। समाज जीवन के तमाम रंगों को महसूस करना किताब की तरह होता है। भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कला भी एक सार्थक माध्यम है। मुझे बचपन से पेटिंग का शौक था। घर में पहले इस विधा से कोई जुड़ा नहीं था। घर का माहौल काफी अध्यात्मिक था। घर के लोग धार्मिक भावना से जुड़े थे। बचपन से पढ़ाई में ड्राइंग मेरा प्रिय विषय रहा। शुरू से ही पढ़ाई के दौरान मैं अपने से बड़ी कक्षाओं के छात्रों की ड्राइंग बनाता था। कई महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में मेरे चित्र समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। मैंने 1958 में चमन स्कूल आफ आर्ट स्कूल खोला, जिसमें शहर के तमाम ड्राइंग के छात्र आज भी ...

विद्रोह की गूंज और मेरठ के ठिकाने

Image
गुलामी की जंजीरें जिस वक्त काटी जाती हैं, तो उनकी आवाज में इतिहास की धमक भी सुनाई देती है। 1857 में शुरू हुए विद्रोह की आग में झुलसते हिंदुस्तान को आजादी की जो शांत छांव 47 में मिली उसके पीछे इतिहास की कई घटनाओं की लंबी कड़ियां रही हैं। इन कड़ियों को एक-दूसरे में पिरोते हुए देखा जाना चाहिए कि वे कौन से इलाके, स्थान और इमारतें हैं, जिनमें क्रांति गूंज रही है। मेरठ में ऐसे स्थलों की कमी नहीं है। हम उन्हें या तो भूलते जा रहे हैं या फिर उन पर ध्यान ही नहीं देना चाहते। ऐसे ही कुछ स्थलों के इतिहास को सुनते हुए हमने महसूस की वह आहट जो इमारतों के पत्थरों के बीच से आती है। वक्त के साथ उस क्रांति की आहट अब धीमी हो रही है। सूरजकुंड पार्क सत्तावन के दौरान मंदिर, मसजिद, शमशानों और मजारों पर कुछ ऐसे फकीर सक्रिय रहते थे। जिनकी इन ठिकानों के अलावा देशी पलटन के सैनिकों में भी रुचि थी। यह फकीर देशी पलटनों के ही करीब क्यों थे? इसके प्रमाण क्रांति क ी महत्वपूर्ण घटनाओं में मिलते हैं। ऐसे ही फकीर ने मेरठ शहर में प्रवेश किया और सूरजकुं ड को अपना ठिकाना बनाया। घने जंगलों से घिरे इस पार्क में दो मील दूर से...

तीरग्रान का जैन मंदिर,मेरठ

Image
मेरठ शहर में कई मंदिर हैं, इनमें से कई प्राचीन मंदिर हैं। जो सदियों पुराने हैं, अपने विशाल स्वरुप के साथ एक इतिहास भी समेटे हुए हैं। इसमें से एक मंदिर तीरग्रान मोहल्ले में स्थित जैन मंदिर भी है। यह मंदिर अपने प्राचीन स्वरुप के साथ लोगों के बीच आज भी आस्था का केंद्र बना है। यह मंदिर हस्तिनापुर में स्थित बड़ा जैन मंदिर के समकक्ष माना गया है।        इस मंदिर को विक्रम संवत् 1668 और 1801 के लगभग का माना गया है। इसलिए अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका निर्माण भी 1801 में हुआ होगा। लाल बलूए पत्थर से बना मंदिर 2500 वर्ग गज में बना हुआ है, इसमे 6 वेदी, 89 मूर्तियां है जो पाषाण और धातु से बनी हैं। इस विशाल मंदिर की ऊंचाई गगनचुंबी शिखर को देखकर आसानी से मापी जा सकती है। इस मंदिर का शिखर 125फीट ऊंचा है। इसके शिखर में 13 फीट ऊ ंचा स्वर्ण कलश स्थापित है। मंदिर का शिखर किसी समय दूर से दिखता था, लेकिन बढ़ती आबादी के चलते यहा मंदिर गलियों के बीच छिप गया। आज भी यह मंदिर शहर के सबसे ऊं चे और प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। इसकी प्राचीनता का अंदाजा इसके अंदर जाकर पता चलता है।...
Image
चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा आयोजित हिंदी दिवस के मौके पर 'समकालीन भारतीय संदर्भ और हिंदी' विषय पर आयोजित संगोष्ठी के अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार केदार नाथ सिंह से बातचीत आम जनता की लड़ाई में लेखक गायब हैं, क्या वजह है? अन्ना के आंदोलन में किसी तरह की कोई विचारधारा तय नहीं थी, इसलिए लेखक भी सक्रिय नहीं हो पाए। जैसे- जेपी आंदोलन की एक विचारधारा थी, उस समय लेखकों की सक्रियता दिखी। किसी आंदोलन के साथ कोई विचारधारा का धरातल होगा तो लेखक खुलकर सामने आएंगे। लेखकों ने लिखा है, ज्यादातर आंदोलनों में समय-समय पर लेखकों ने अपनी भूमिका अदा की। इंटरनेट में बच्चों की व्यस्तता है, किताबों की तरफ बच्चों का रुझान नही है?  किताबों के लिए मानवीय पहलू भी है, जिसमें पाठक का जुड़ाव गहरा होता है। जैसे शिक्षकों के साथ छात्रों का है, मानवीय रिश्तों की बात है। यहां एक संबंध प्रत्यक्ष रूप से होता है, जिसमें छात्र शिक्षक से जुड़ता है। मशीन मानवीय क्षति की पूर्ति नहीं कर सकती। इंटरनेट पर काफी हद तक हिन्दी की भी किताबें हैं, लोग पढ़ते हैं। इंटरनेट किताबों की जगह नही ले सकता, प्रिंट मीडिया हमेशा अप...

बातचीत-अनूप जलोटा, मेरठ

Image
अनूप जलोटा भजन गायन यात्रा के सबसे अग्रणी सारथी हैं और आज भजन को सरलता और सफलता से जनमानस के दिल और आम घरों तक पहुंचाने का बहुत सा श्रेय अनूप जलोटा को जाता है। वह कालीपल्टन मंदिर मेरठ में आयोजित भजन संध्या में आए  हुए थे। उत्तराखंड के नैनीताल में पुरषोत्तम दास जलोटा के घर में जन्मे अनूप जलोटा को संगीत शिक्षा अपने पिता से विरासत में मिली। 10 साल की उम्र से गाना शुरू किया था और अब तक लगभग 5 हजार कार्यक्रम और 1200 से ज्यादा भजन, 5000 से अधिक आयोजन और 200 से अधिक भजन और गजल के एलबम यह कहानी खुद बयान करती हंै, चलिए जानते हैं उनके संगीत के सफर के कुछ अनछुए पहलुओं को। अपने शुरूआती समय के बारे में कुछ बताइए? छात्र जीवन बहुत ही अच्छा था, मेरी पढ़ाई-लिखाई लखनऊ से हुई है। कॉलेज के दिनों से ही मेरे संगीत के कार्यक्रम करने लगा था। मैं किशोर कुमार के गाने गाता था, भजन गाता था और जब समय मिलता था तो मै क्रिकेट खेलता था. मुझे क्रिकेट खेलने का बहुत शौक था, अगर गायक नहीं होता तो क्रिकेटर होता। अच्छा, तो क्या आप क्रिकेट देखते भी हैं ,आज की क्रिकेट टीम में आप को कौन पसंद है? हां, मै तो बहुत देखता हू...

ब्रिगेडियर आरके सिंह, महावीर चक्र विजेता

Image
मेरठ वीर भूमि रही है यहां क्रांतिकारियों के अलावा सैनिकों ने लड़ाई में बहादुरी के जौहर दिखाए। 1971 की लड़ाई में महावीर चक्र विजेता आरके सिंह दौराला के भरौटा के किसान परिवार में जन्में। उनके पिता देवी सिंह ठाकुर स्वतंत्रता सेनानी रहें हैं, बचपन से पिता की इच्छा थी कि उनका बेटा देश की सेवा करे। क्योंकि देवी सिंह को उनके पिता ने बड़े पुत्र होने के नाते फौज में नहीं जाने दिया, लेकिन उन्होंने देश के  स्वतंत्रता आंदोलन में लगातार हिस्सा लिया। उनकी इस इच्छा को पूरा किया, उनके पुत्र आरके सिंह ने। वह बारहवीं में एनएस कॉलेज की पढ़ाई ही कर रहे थे कि एनडीए की प्रवेश परीक्षा में बैठ गए। पढ़ने और देश के लिए कुछ करने की तमन्ना के चलते उनको एनडीए की प्रवेश परीक्षा में सफलता मिली और 1950 में देहरादून के सिविल सर्विसेज विंग में गए। यहां उन्होंने अपनी ट्रेनिंग पूरी की और 1954 में पंजाब रेजीमेंट ज्वाइन किया। यहां ट्रेनिंग के दौरान बहुत से महत्वपूर्ण कोर्स कराए गए। उनके बेहतर परफॉर्मेंस को देखते हुए उन्हें यूनाइटेड नेशन में कांगों जाने का अवसर दिया गया। 1965 में उन्होंने स्टाफ कॉलेज प्रतियोगिता वैलिंग्टन ...

मेरठ शहर के पुस्तकालय

Image
किसी ने कहा है कि किताबों को पढ़िए, रोज नहीं तो कभी-कभार ही पढ़िए, अगर कभी नहीं पढ़ सकते हैं, तो कम से कम किताबों को छू ही लिया कीजिए। क्योंकि किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। हर शहर में इंसान की दोस्त कही जाने वाली किताबों का पुस्तकालय बेहतर ठिकाना होता है। ज्ञान के इन ठिकानों में छिपा होता है एक ऐसा रिश्ता, जिसे पीढ़ियों से हम महसूस करते आए हैं। कहते हैं कि किताबें इंसान की जिंदगी बदलती हैं। इंसानियत के रिश्तों का पैगाम देने वाले वह ठिकाने जहां हजारों किताबें लोगों की अंगुलियों से हमेशा एक रिश्ता महसूस करती रहीं हैं। आइए जानते हैं, शहर में मौजूद जिंदगी के किताबनुमा इन ठिकानों की दास्तां-     हर इमारतों का शहर के लोगों से अनूठा रिश्ता रहा है, यह इमारत धार्मिक स्थल हो, ऐतिहासिक इमारत हो या स्कूल कॉलेज। ऐसे ही शहर में एक लम्बे अरसे से इंसानी किताबत का लेखा-जोखा समेटे कुछ भी हैं। यह पुस्तकालय बरसों से शहर के साथ बाहर के लोगों के लिए अहम जगह रहीं हैं। इनमें मौजूद महत्वपूर्ण किताबें इंसान से अपना भी रिश्ता बना लेती हैं। इन पुस्तकालयों की शहर में एक खासी अहमियत है। अने...

काम के बिना इंसान सिर्फ सांस लेता है, योगेंद्र रस्तोगी, मेरठ

Image
साठ के दशक से आज तक भगवान के जो रूप हम देखते हैं या अपने घरों की दीवारों पर लटकाते हैं, उनमें से ज्यादातर देश के नामचीन धार्मिक चित्रकला के पुरोधा योगेंद्र रस्तोगी के बनाए होते हैं। सात दशक पार कर चुके योगेंद्र रस्तोगी पिछले 50 सालों में हजारों की तादाद में धार्मिक चित्र बना चुके हैं और आज भी वह इस चित्र पंरपरा को गति दे रहे हैं। पेश हैं, उनसे  बातचीत के कुछ अंश- -कला से जुड़ाव कैसे हुआ? मुझे बचपन से चित्रकारी का शौक था। 1959 में महात्मा गांधी का पहला चित्र बनाया था। शुरुआती दौर में आॅयल, वाटर कलर और एक्रेलिक माध्यम से चित्र बनाए। शुरू में एक साल में 40 से 50 चित्र बनाए, लेकिन अब उम्र के मुताबिक काम करता हूं, तो तकरीबन 20-21 चित्र बना लेता हूं। अब सिर्फ पोस्टर और एक्रेलिक कलर के माध्यम से ही चित्र बनाता हूं। -आपने किन पत्र-पत्रिकाओं के लिए चित्र बनाए और उपलब्धियां कब जुड़नी शुरू हुर्इं? मैंने कई धार्मिक किताबों के, पत्र-पत्रिकाओं के लिए चित्र बनाए। 1963 में जब चीन युद्ध चल रहा था, तो मैंने एक चित्र बनाया 'लैंड टू डिफेंड'। यह चित्र लोगों के बीच चर्चा का विषय बना। इस चित्र ...

बातचीत- प्रो केसी गुप्ता, सेवानिवृत्त प्रोफेसर मेरठ कॉलेज

Image
आपका शुरुआती दौर कैसा बीता? मेरी पैदाइश 1932 को आगरा में हुई थी, प्राथमिक स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ली। उस समय जो माहौल था, उसमें ज्यादातर बुजुर्ग कांग्रेसी थे और बच्चे आरएसएस की शाखा में जाते थे, सो मैं भी शाखा में जाया करता था।  उस समय देश की आजादी का माहौल था, लोग अच्छा साहित्य लिख रहे थे। पिता एक वकील के मुंशी थे, वे बेहद सरल-सहज स्वभाव के थे। वे नैतिकता का पाठ पढ़ाने के बजाय बच्चों को नैतिक माहौल देने पर विश्वास करते थे। युवा के तौर पर पहली बार आपने किस पेशे को सही समझा था? आगरा विश्वविद्यालय से इंग्लिश में एमए करने के बाद, 1957 में दिल्ली गया। वहां हिंदुस्तान समाचार सेवा में रिर्पोटर की हैसियत से काम किया। नौकरी के साथ भारत  सेवक समाज संस्था से जुड़ा। यहां मात्र एक साल ही रहा, क्योंकि मेरा मन राजनीति शास्त्र से एमए करने का था, इसलिए  मैं अपने भाई के पास पहुंच गया, जो डीएवी कॉलेज कानपुर मेंं केमिस्ट्री के प्रोफेसर थे। वहां राजनीति शास्त्र में एमए किया, इस विषय में इतना मन लगा कि मैंने यह परीक्षा प्रथम श्रेणी में उर्त्तीण की। यहां भी पढ़ाई के साथ एक निजी कंपनी में सेल...

ऊंचाइयों का नाम नौनिहाल-प्रतिपाल

Image
जिंदगी के संघर्ष के दिनों में भी इंसान अपने जुनूनी कामों को जारी रखता है। वह उतार-चढ़ाव के बीच भी अपने शौक के जरिए लोगों के दिमाग पर छाप छोड़ देता है। जिंदगी के सात दशक गुजार चुके  प्रतिपाल सिंह और नौनिहाल सिंह। प्रतिपाल सिंह ने बचपन में साईकिल का साथ किया और आज भी साइकिल से ही चलते हैं। दोनों ही संघर्षों में एक साथ सुख-दुख के साथी रहे। प्रतिपाल और नौनिहाल को बचपन से साहसी कामों में रुचि थी। बचपन में लंबी दूरी की साइकिलिंग कब जुनून में बदल गई, उन्हें खुद नहीं पता चला।       दोस्ती क ा सफर हमेशा साथ रहा, वह नौकरी करने आर्डिनेंस फैक्ट्री भी एक साथ गए। यहां रिटायरमेंट तक एक साथ परिवार के भरण-पोषण की जुगत लगाते रहे। दोनों का साहस भी भी उफान मार रहा था, सो कंपनी की तरफ से भी पर्वतारोहण और ट्रैकिंग के लिए अक्सर साथ जाते थे। यहां कंचनजंगा ट्रैकिंग क्लब का गठन कर साइकिलिंग, पर्वतारोहण और ट्रैकिंग के लिए जाते रहे। दोनों दोस्तों का साहस पहली बार तब रंग लाया, जब दोनों ने 1986 में लेह-लद्दाख की पर्वत चोटियों तक का सफर साईकिल से पूरा किया। यह सफर दिल्ली से 18380 किमी का...

शाहपीर मकबरा, मेरठ

Image
बेगमपुल चौराहे से हापुड़ रोड पर चलने पर इंदिरा चौक के बाद दाहिनी ओर शाहपीर गेट पड़ता है। इसी गेट से अंदर जाने पर एक लाल बलुआ पत्थर का मकबरा नजर आएगा। यह मकबरा दीन-ईमान के प्रसारक शाहपीर रहमत उल्लाह का है।  दरअसल यह मकबरा शाहपीर रहमत उल्लाह की मजार है और शाहपीर के मकबरे के नाम से जाना जाता है। रहमत उल्लाह का जन्म रमजान की पहली तिथि को 978 हिजरी (1557 ई.) में मेरठ के शाहपीर गेट पर हुआ। कहा जाता है कि इनके वंशजों की नवीं पीढ़ी आज भी शाहपीर गेट पर उसी मकान में रह रही है। यह भी कहा जाता है कि इनके पूर्वज ईरान के शिराज शहर से आए थे। बेहद सरल और सहज स्वभाव के शाहपीर की लोगों के बीच खासी आस्था थी। उनके ईमान के रास्ते को देखकर आज भी लोग यहां सिर झुकाते नजर आते हैं। उन्होंने लोगों को अपने दीन और ईमान पर चलने की शिक्षा दी। इस मकबरे के सामने इनके वंशजों की मजारें भी मौजूद हैं, जिसकी सुरक्षा मौजूदा पीढ़ी द्वारा की जाती है । फिलहाल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग भी इसका संरक्षण कर रहा है, जो कि मेरठ शहर के पुरातात्विक अवशेषों को संरक्षित करने के प्रयास में है। इस मकबरे का निर्माण 1620 ई. में नूरज...

साक्षात्कार- प्रोफेसर घंमडी लाल मित्तल, फिजिक्स

Image
बचपन में कैसा माहौल मिला और पढ़ाई-लिखाई कै से हुई? बचपन परीक्षितगढ़ रोड पर जेई गांव में गुजरा यहीं मूल निवास भी था, पिता किसान थे। घर में गाय-भैंस भी पलीं थीं, मेरे पिता का मन था कि मैं खेती-किसानी और जानवरों की देखभाल में उनका साथ दूं। मेरा इन कामों की बजाय पढ़ाई-लिखाई की ओर ज्यादा था, इसलिए पिता से नजर बचाकर दिनभर घर से गायब रहता और देर रात लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करता था। हमेशा शहर आने के फिराक में रहता था, क्योंकि शहर में बिजली की सुविधा थी। परीक्षितगढ़ के गांधी स्मारक देवनागरी कॉलेज से हाई स्कूल और 1953 में मेरठ कॉलेज आया यहां  एमएससी तक पढ़ाई की। पढ़ाई में अव्वल था, हर कक्षा में प्रथम रहा, एमएससी में अच्छे अंक प्राप्त करने पर छात्रवृत्ति 'बरसरी '  मिलती थी। शिक्षण कार्य से कब जुड़े और लेखन कब शुरू किया? एएस इंटर कॉलेज मवाना में पहली बार शिक्षक बना और 1999 में यहीं से रिटायर हुआ। यहां कृषि भौतिकी विषय के छात्रों को पढ़ाता था, कृषि भौतिकी विषय में छात्र कमजोर थे, क्योंकि उस समय इस विषय से जुड़ी किताबे कम थीं। नगीन प्रकाशन के मालिक भैरव लाल जैन ने मुझे किताब लिखने को कहा। इस विष...

बेजोड़ इमारत नारी निकेतन

Image
मेरठ, विभाजन के समय शरणर्थियों के लिए बना नारी निकेतन नारी निकेतन शहर की बेजोड़ इमारतों में है। यह इमारत मुगल वास्तुकला से प्रेरित है, जो वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। कहा जाता है कि पहले के समय में यह इमारत बेगम समरु क ा महल था। यह इमारत लगभग 100 साल पुरानी है, जो बाद में इलाही बख्श जो समरु के समय के निर्माणकर्ता थे, ने लिया। बाद में यह शरणार्थी ट्रस्ट के हाथ में गई। 1857 के बाद की इमारतों में एक है। जो आज नारी निकेतन की इमारत के रुप में स्थापित है। आज इसी ट्रस्ट के अन्तर्गत देखरेख में है।  विभाजन के समय पंजाब और पाकिस्तान से लोग आकर यहीं ठहरे थे। इसमें ज्यादातर लड़कियां और महिलाएं थीं, जो बाद तक रहीं। बाद में शहर के अन्य इलाकों में विस्थापित हुए। इसके चारों ओर कई इमारतें थीं जो बेगम समरु की देन थीं। जैसे बेगमबाग, सेंट जोंस स्कूल और सीडीए सेंट्रल बिल्ंिडग। यह इमारतें पहले तो काफी सुरक्षित रहीं लेकिन रखरखाव के अभाव में यह इमारतें खंडहर हो गई हैं। पिछले तीस सालोंं से देख रहा हूं, इन इमारतों को शहर के विकास के साथ इन इमारतों ने दम तोड़ा है। पहले एक शहर था जिसमें ऐतिहासिक इमारतें थीं।...

सपनों को पंख लगाते हुनरमंद

Image
मेरठ, जिंदगी में मंजिल पाने की छटपटाहट हर किसी में होती है। सपनों को आकार देने के लिए वह हमेशा जी तोड़ संघर्ष भी करता है। बेहतर भविष्य के लिए वह अक्सर संसाधनों के अभाव में भी वह जूझता है, विपरीत परिस्थितियों में अपना संघर्ष जारी रखता है, लेकिन सपनों की इस मंजिल के करीब पहुंचकर वह अक्सर टूटकर हालातों से समझौता कर लेता है। क्योंकि अपनी मंजिलों के नजदीक पंहुचने पर उसके हाथ से समय निकल चुका होता है। लेकिन जिंदगी में मंजिल तक का सफर पूरा न कर पाने की कसक मन में लिए रहता है। लेकिन अपने हुनर का हमेशा सटीक इस्तेमाल करते हुए अपने जैसे लोगों की जिंदगियों में वह उन कमियों को दूर करने की भरसक कोशिश करता है। इंसान अपनी मंजिल को पाने में अक्सर हालातों से टूट जाता है, जो इन हालातों में भी नहीं टूटता वह जिंदगी की उन मंजिलों को पा लेता है। युवाओं की सपनों की यह दुनिया बेहद रंगीन होती है, लेकिन मुकाम हासिल न होने पर वह दूसरे की जिंदगी में रंग भरने की कोशिश करता है जो सलाम के लायक होती है। वह चाहे युवाओं की सपनों की कोई दुनिया क्यों न हो। ऐसे ही शहर की खेल की दुनिया का खेल निराला है, यहां शरीर का दमख...

इन हाथों ने जन्मे कई

Image
 मेरठ, किसी समय में प्रसव के दौरान महिलाओं के सबसे नजदीक समझा जाने वाला संवेदनशील रिश्ता दाई मां का था। हर दिन किसी न किसी के जान के टुकड़े को नई जिंदगी देती है और उसकी किलकारियों के साथ ही थाली पीटकर शुभ सूचना लोगों तक पहुंचाती। इसी तरह रोजाना किसी न किसी नए  मेहमान को जिंदगी देने वाले हाथों पर आज झुर्रियां हैं, जिसने अनगिनत नन्ही जानों को इस दुनिया में पहुंचा कर आगे का सफर तय किया। आंख खुलने के पहले बने इस रिश्ते के लिए आज हमारी आंखें नहीं खुलतीं। आज उसे अपने इन बूढ़े हाथों पर यकीन नहीं होता कि सामने खडेÞ नामचीन व्यक्ति की पैदाइस इन्ही हाथों से हुई है।    सदियों से हमारी पंरपराओं में रही दाई मां की एक खास जगह रही है। इस मां के हाथों ने कई नाजुक जानों को इस दुनिया में सुरक्षित पहुंचाया। हर पीढ़ी में मां की प्रसव पीड़ा को समझा और एक नई पीढ़ी सौंप आगे बढ़ी। इतना ही नहीं उसने नाजुक सी जान की लगातार परवरिश भी की उसने नन्ही जान को नन्हे पैरों पर खड़ा होने लायक बनाया। बचपन से जवानी और जवानी से बुढ़ापे तक का सफर इन्ही मजबूत कदमों के सहारे तय किया। जिंदगी के सफर में हमने फिर क...