कर्ण की कर्म स्थली पर ही कर्ण जैसे दानी की तलाश

  पौराणिक, ऐतिहासिक शहर मेरठ में कई प्राचीन धरोहरें अतीत के गवाह हैं। इन्हें पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित कर अच्छी खासी आमदनी जुटाई जा सकती है। इससे इस शहर की पहचान बन चुकी सांस्कृतिक, पौराणिक, ऐतिहासिक विरासत को भी संजोया जा सकता है। इस बार पढ़िए पर्यटन की संभावनाओं की पड़ताल करती अनूप मिश्र की एक रिपोर्ट-
  पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत को संवारने की कवायद  किसी महाभारत से कम साबित होती नहीं दिखती। सांस्कृतिक, ऐतिहासिक स्थलों को संवारने  के लिए 2006-07 में पहली बार मेरठ डेवलपमेंट एथॉरिटी को दो करोड़ रुपए मिले थे। दूसरी बार 2012 में  महाभाारत सर्किट योजना के तहत 50 करोड़ रुपए स्वीकृत हुए हैं। लेकिन इस बार एमडीए को हस्तिनापुर में पर्यटन हब विकसित करने के लिए एक अदद जमीन की तलाश है। जहां अतीत की विरासत को संजोने की पहल की जा सके। रियासत और जायदादों के दान के किस्से भले ही आपको किसी गुजरे जमाने की बात लगती हों, लेकिन एमडीए को आज भी किसी  कर्ण की कर्म स्थली पर ही कर्ण जैसे दानी की तलाश है।  एक ओर धनराशि है, लेकिन जमीन नहीं। दूसरी ओर खंडहर होती विरासत हैं, लेकिन धन नहीं। इसे आप भी गजब की विडंबना कह सकते हैं। कुछ भी हो  पांडव और दानवीर कर्ण को अपनी ही कर्मस्थली पर अपने अतीत से कुछ हिस्से की दरकार है। ताकि दिलों में ही नहीं बल्कि हकीकत में जिंदा रह सके   विरासत। 
        मेरठ को पर्यटन के लिहाज से विकसित करने के लिए महाभारत सर्कि ट योजना बनी थी। इस योजना के तहत कुछ स्थलों के जीर्णोंद्धार के साथ कोशिश हुई, लेकिन   कारगर  नहीं साबित हुई। चूंकि भारत में मेरठ छावनी एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है, पूरे भारतीय महाद्वीप में बड़े-बड़े सम्राज्य चाहे वो कुषाण, गुप्त, मौर्य या अन्य काल के रहे हों, किसी न किसी रुप में मेरठ से जुड़े रहे हैं। पाकिस्तान की पर्यटन की साइट पर देखने पर हड़प्पा की मोहनजोदड़ो सभ्यता का जिक्र जरुर मिलता है।
सिंधु सभ्यता का पूर्वी भाग में मेरठ आता है, जिसका जिक्र  सिंधु सभ्यता से लेकर 1857 के विद्रोह तक का उल्लेख इतिहास के पन्नों में दर्ज है। शहर की हेरिटेज जोन सोसाइटी की पहल पर 2002 के दौरान छावनी क्षेत्र में  1857 के ऐतिहासिक स्थलों का जीर्णोंद्धार हुआ, शिलालेख भी लगे।  एनएएस कॉलेज मेरठ के इतिहास विभाग के रीडर डा देवेश शर्मा कहते हैं कि यहां कई सतहों में सभ्यताएं यहां दबी हैं, जिनका समयकाल बेहद प्राचीन है। शहरों के विकसित होने के पहले आदिमानव के अवशेष तक यहां मिले हैं। बागपत के आलमगीर इलाके में लगभग 1000 साल पुराने तराशे हुए हथियार तक मिले हैं।

   जैनधर्म
प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने हस्तिनापुर में तपस्या की थी, यहीं उन्होेंने गन्ने का रस पीकर उपवास तोड़ा था। इस घटना का जिक्र जैनधर्म के ग्रंथों में भी है। जैनधर्म के श्वेतांंबर-पीतांबर दोनों समुदाय के हस्तिनापुर में धार्मिक स्थल हैं। जो पुरातनकाल में कई तीर्थंकरों से जुड़ रहे हैं।
 सिंधु सभ्यता
बागपत के आलमगीर, सिनौली इलाके में 5000 साल पुराने सिंधु सभ्यता के अवशेष मिले, जो हड़प्पा सभ्यता से पहले का है। यहां आर्केलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया ने उत्खनन भी किया।
 रामायण कालीन
गौतमबुद्ध नगर (नोयडा) का बिस्रख गांव, माना जाता है कि रावण के पिता बिसरवा के नाम पर इसका नामकरण हुआ। यहां रावण दहन नहीं होता और इसे रावण गांव के नाम से जाना जाता है। इसी तरह बागपत के एक गांव का नाम रावण गांव है। यहां छठी और सांतवी शताब्दी की भगवान विष्णु की मूर्तियां और स्तंभ मौजूद हैं।
महाभारत कालीन
 हस्तिनापुर भारत के संपन्न राजनीतिक स्थलों में रहा है। कुरु वंश में कुरु परिक्षेत्र दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरियाणा भी इसी कढ़ी में जुड़ते हैं। लेकिन महाभारतकाल से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों के अवशेषों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण तक नहीं हुआ। एमएम मोदी डिग्री कॉलेज के इतिहास विभाग के रीडर डॉ कृष्णकांत शर्मा कहते हैं कि महाभारत काल का केंद्र हस्तिनापुर था, यह सत्ता का केंद्र थी। भारत में सोलह महाजनपद में कुरु भी था, जिसकी राजधानी हस्तिनापुर थी। यहां विदुर टीले की खुदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के निदेशक और पुरातत्व विज्ञानी प्रोफेसर वीबी लाल ने 1950 में की थी। खुदाई में कई सभ्यताओं के अवशेष मिले, जो मोहनजोदड़ो सभ्यता के समकालीन सभ्यता के थे। यह महाभारतकालीन, छठी शताब्दी के महावीर बुद्ध के समय के अवशेष, कुषाण, गुप्त, राजपूत और मुगल काल के थे। मेरठ का नाम मयराष्ट्र होने के बारे में कहा जाता है कि मय दानव कुशल शिल्पी था। जिसने पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) को बनाया। इसके पुरस्कार स्वरुप उसे एक शहर दिया गया, जिसे मयराष्ट्र कहा गया। मेरठ को रावण की पत्नी मंदोदरी की जन्मस्थली भी माना जाता है। जनश्रुति है कि मेरठ शहर में टीलेनुमा पुराना कोतवाली क्षेत्र है, जहां कभी मंदोदरी का महल था और वे यहां से बिल्वेश्वर मंदिर पूजा के लिए जाती थी। 
 अन्य धार्मिक जगहें
 मेरठ में सूरजकुंड के आसपास लगभग 7वीं शताब्दी के मंदिरों के अवशेष मिले। आबू का मकबरा, शाहपीर का मकबरा के अलावा इस्लाम धर्म से जुडेÞ कुछ ऐतिहासिक स्थल शाही ईदगाह है जो लगभग 800 साल पुरानी है। जामा मसजिद भारतीय महाद्वीप की प्राचीन मसजिद है। छावनी का सेंट जोंस चर्च उत्तर भारत में अंग्रेजों का बनाया पहला चर्च है। गढ़मुक्तेश्वर में महाभारतकालीन अवशेष मिले हैं, जिसमें भगवान विष्णु की मूर्तियां भी शामिल हैं। इस स्थल का शिवपुराण में इसका जिक्र है, मान्यता है कि यह जगह इंसान की मुक्ति की कल्पना की पंरपरा बनी। यहां लगभग 8वीं और 9वीं शताब्दी की भगवान विष्णु की मूर्तियां, भगवान परशुराम शैली के प्राचीन शिवलिंग के अवशेष मौजूद हैं। यहां बलराम मंदिर है,जिसमें राजपूत काल की भगवान कृष्ण के भाई बलदाऊ (बलराम) की मूर्ति है। किला परीक्षितगढ़, बागपत, हस्तिनापुर, मेरठ, लोनी, बड़ौत का बड़का गांव  से कुषाण काल की एक गुल्लक में पांच सिक्के और कुषाण काल की र्इंटें भी मिलीं। लोनी रामायण काल में भगवान राम के पुत्र लव के नाम से जुड़ा माना जाता है। किलापरीक्षितगढ़ को अर्जुन तीसरी पीढ़ी के थे,उन्होंने हस्तिनापुर को बाढ़ की वजह से छोड़ा और सुरक्षित स्थान चुना जो किलापरीक्षितगढ़ कहलाया। किलापरीक्षितगढ़ मेंं गुर्जर राजा कर्दम सिंह ने अंगे्रजों के खिलाफ विद्रोह कर मेरठ के उत्तरी भाग को मुक्त कराया था। लगभग 200 साल पुराना कैथोलिकं सरधना का चर्च, हस्तिनापुर को  गुरुगोविंद सिंह के पंज प्यारे धर्म की जन्मस्थलों में माना जाता है, जो लगभग 300 साल पुरानी है।

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