स्त्री इस्तेमाल की चीज क्यों समझी जाती है
नेटवर्क ६ से जेन्नी शबनम जी का आलेख..... आज के हिन्दुस्तान में स्त्री एक वस्तु मानी जाती है; समय बदला, संस्कृति बदली, पीढियां बदली, लेकिन स्त्री जहाँ थी वहीं है; जिसे हर कोई अपनी पसंद के अनुरूप जांचता परखता है फिर अपनी सुविधा के हिसाब से चुनता है, और यह हर स्त्री की नियति है| आज के सन्दर्भ में स्त्री वस्तु के साथ साथ एक विषय भी है जिसपर जब चाहे जहां चाहे विस्तृत चर्चा हो सकती है| चर्चा में उसके शरीर से लेकर उसके कर्त्तव्य, अधिकार और उत्पीड़न की बात होती है| अपनी सोच और संस्कृति के हिसाब से सभी अपने – अपने पैमाने पर उसे तौलते हैं| ये भी तय है कि मान्य और स्थापित परम्पराओं से स्त्री ज़रा भी विलग हुई कि उसकी कर्तव्यपरायणता ख़त्म और समाज को दूषित करने वाली मान ली जाती है| युग परिवर्तन और क्रान्ति का परिणाम है कि स्त्री सचेत हुई है, लेकिन अपनी पीड़ा से मुक्ति कहाँ ढूंढे? किससे कहे अपनी व्यथा? युगों युगों से भोग्या स्त्री आज भी महज़ एक वस्तु हीं है, चाहे जिस रूप में इस्तेमाल हो| कभी रिश्तों की परिधि तो कभी प्रेम उपहार देकर उस पर एहसान किया जाता है कि देखो तुम किस दुर्गति में रहने लायक ...